रेती खनन: स्थानीय विकास या प्रशासनिक षड्यंत्र?
क्या आपकी ग्रामसभा को मिल रही है खनन की रॉयल्टी?
रेती खनन से जुड़े कई नियम और कानून हैं जो स्थानीय ग्रामसभा के विकास के लिए आर्थिक सहायता प्रदान करते हैं। गुजरात में लागू नियमों के अनुसार, रेती खनन से होने वाली 90% रॉयल्टी की आय ग्रामसभा को दी जानी चाहिए। इस आय का उद्देश्य यह है कि जिस गाँव में खनन प्रक्रिया हो रही है, उस गाँव का विकास हो सके। लेकिन सवाल यह उठता है: क्या इस राशि का सही उपयोग हो रहा है?
अवैध खनन का खेल: स्थानीय विकास में बाधा
गुजरात के कई गाँवों में अवैध रेती खनन बड़े पैमाने पर हो रहा है। अखबारों और सोशल मीडिया में इसकी खबरें अक्सर आती रहती हैं। लेकिन यह अवैध खनन स्थानीय प्रशासन और सरपंच की नाक के नीचे होने के बावजूद क्यों नहीं रुक रहा? क्या स्थानीय सरपंच, पंचायत, और प्रशासनिक अधिकारी इसकी अनदेखी कर रहे हैं, या इसमें शामिल हैं?
अगर अवैध खनन को रोका जाए, तो खनन से मिलने वाली 90% रॉयल्टी सीधे ग्रामसभा को "ग्रांट इन एड" के रूप में मिल सकती है। यह राशि ग्रामीण विकास, सड़क निर्माण, शिक्षा, और अन्य बुनियादी सुविधाओं में इस्तेमाल हो सकती है। लेकिन अवैध खनन और प्रशासन की लापरवाही से गाँवों के विकास में रुकावट आ रही है।
अवैध पुलिया: पर्यावरण और जल प्रवाह को नुकसान
अवैध खनन के लिए नर्मदा नदी पर अवैध पुलिया बनाई जा रही हैं। ये पुलिया न केवल नदी के प्राकृतिक प्रवाह को बाधित कर रही हैं, बल्कि पर्यावरण और जल-जीवन को भी भारी नुकसान पहुँचा रही हैं। सुप्रीम कोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने स्पष्ट आदेश दिए हैं कि ऐसी गतिविधियाँ कानूनन दंडनीय हैं।
इन पुलियों और अवैध खनन की वजह से नर्मदा नदी का पारिस्थितिक तंत्र बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। क्या यह पर्यावरणीय विनाश केवल मुनाफाखोरी के लिए किया जा रहा है?
अनुसूचित क्षेत्र: संविधानिक अधिकारों का उल्लंघन
भरूच जिले के झगड़िया, नेत्रंग, वालिया, और डेडियापाड़ा जैसे इलाके भारत के संविधान की पांचवीं अनुसूची के तहत संरक्षित क्षेत्र हैं। संविधान के अनुच्छेद 244(1) के अनुसार, इन क्षेत्रों में प्रशासन के लिए विशेष कानून लागू हैं। लेकिन इन कानूनों को नजरअंदाज कर खनन माफिया और प्रशासनिक अधिकारियों की मिलीभगत से अवैध खनन जारी है।
पेसा अधिनियम 1996 (The Provisions of the
Panchayats (Extension to the Scheduled Areas) Act, 1996) के तहत, अनुसूचित क्षेत्रों में किसी भी खनन प्रक्रिया के लिए ग्रामसभा की पूर्व सहमति अनिवार्य है। लेकिन यहाँ ग्रामसभा की मंजूरी के बिना ही खनन कार्य हो रहा है। यह न केवल संविधान का उल्लंघन है, बल्कि आदिवासी अधिकारों की सीधी अवहेलना भी है।
क्या भरूच जिले के गाँवों को मिलेगा उनका हक?
वड़ोदरा जिले के कई गाँव, जो नर्मदा नदी से सटे हुए हैं, वहाँ से रेती खनिज भरूच जिले के झगड़िया तहसील के स्टॉक में लाया जा रहा है। इस प्रक्रिया में भरूच जिले के गाँवों का पर्यावरण, सड़कें, और बुनियादी ढांचा प्रभावित हो रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या भरूच जिले के इन गाँवों को खनन से मिलने वाली रॉयल्टी का लाभ मिलेगा?
खनन की गतिविधियों से होने वाले नुकसान का भार इन गाँवों पर पड़ रहा है, लेकिन फायदा कहीं और पहुँच रहा है। क्या यह इन गाँवों के अधिकारों का हनन नहीं है?
प्रशासन और जनता की जिम्मेदारी
खनन गतिविधियों की निगरानी और नियंत्रण की जिम्मेदारी सरपंच, तालुका पंचायत, जिला पंचायत, डीडीओ, कलेक्टर, और भूवैज्ञानिक विभाग की है। लेकिन जब अवैध खनन उनकी आँखों के सामने हो रहा है, तो सवाल उठता है:
क्या यह केवल लापरवाही है, या फिर इस पूरे षड्यंत्र में सबकी हिस्सेदारी है?
एकजुटता की जरूरत
गाँवों के विकास और पर्यावरण की रक्षा के लिए, यह जरूरी है कि अवैध खनन को रोका जाए। यह तभी संभव है जब स्थानीय लोग, पर्यावरणविद, और सामाजिक कार्यकर्ता एकजुट होकर इस मुद्दे पर आवाज उठाएँ।
“नदी बचेगी, तो जीवन बचेगा। गाँव बचेगा, तो देश बचेगा।”
ग्रामसभा को चाहिए कि वह अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाए और यह सुनिश्चित करे कि खनन से मिलने वाली 90% रॉयल्टी उनके विकास कार्यों में लगे।
न्याय के लिए जागरूकता जरूरी है
यह लेख उन सभी लोगों से अपील करता है जो पर्यावरण, संविधान, और आदिवासी अधिकारों के संरक्षण में विश्वास रखते हैं। क्या आप इस लड़ाई में शामिल होंगे?
आइए, मिलकर यह सुनिश्चित करें कि न केवल संविधान का पालन हो, बल्कि गाँवों का वास्तविक विकास भी हो।
डॉ. भाविनकुमार शांतिलाल वसावा,
भरूच
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