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Friday, May 16, 2025

गुजरात मॉडल 2017 के बाद: संविधान बदलने की जरूरत नहीं, बस पालन मत करो!

 


गुजरात  मॉडल 2017 के बाद: संविधान बदलने की जरूरत नहीं, बस पालन मत करो!

क्या आप जानते हैं कि आपके देश का संविधान, जो हर नागरिक के अधिकारों की रक्षा करता है, कुछ समुदायों के लिए सिर्फ कागज का टुकड़ा बनकर रह गया है? क्या आपने कभी सोचा कि आदिवासी समुदाय, जिन्हें संविधान ने विशेष अधिकार दिए, आज अपनी जमीन, संस्कृति और जीवनशैली खो रहे हैं? आइए, गुजरात मॉडल के उस अंधेरे सच को उजागर करें, जिसके बारे में कोई बोलना नहीं चाहता!

में आपका दोस्त  डॉ. भाविनकुमार शांतिलाल वसावा, भरूच से


संविधान का अपमान: आदिवासी अधिकारों की अनदेखी

भारत का संविधान आदिवासी समुदायों को आर्टिकल 244(1) और पांचवीं अनुसूची के तहत विशेष सुरक्षा प्रदान करता हैइन प्रावधानों के अनुसार, अनुसूचित क्षेत्रों में कोई भी कानून लागू करने से पहले ट्राइबल एडवाइजरी काउंसिल (TAC) की सलाह अनिवार्य हैलेकिन गुजरात में 2017 के बाद से क्या हो रहा है? नए नियम और कानून बनाए जा रहे हैं, जो सीधे सामान्य क्षेत्रों के नियमों को अनुसूचित क्षेत्रों पर थोप रहे हैंआदिवासियों के लिए अलग से प्रावधान? वह तो जैसे भूल ही गए!

सुप्रीम कोर्ट ने केरल सरकार बनाम नित्या (2016) मामले में स्पष्ट कहा था कि आदिवासी समुदायों के अधिकारों का उल्लंघन संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ हैफिर भी, गुजरात में वन अधिकार अधिनियम (FRA, 2006) और पेसा अधिनियम (1996) जैसे कानूनों को लागू करने में जानबूझकर लापरवाही बरती जा रही हैयह सिर्फ लापरवाही नहीं, यह एक सुनियोजित साजिश है, जिसके तहत आदिवासियों को उनकी जमीन और संस्कृति से वंचित किया जा रहा है

क्या यह संविधान का अपमान नहीं? क्या यह लोकतंत्र की हत्या नहीं?


विस्थापन का दर्द: आदिवासियों की पुश्तैनी जमीन पर डाका

स्टैच्यू ऑफ यूनिटी को देश की शान बताया जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसके लिए गुजरात के केवड़िया में सैकड़ों आदिवासी परिवारों को उनकी पुश्तैनी जमीन से बेदखल कर दिया गया? यह सिर्फ एक उदाहरण हैगुजरात में औद्योगिक परियोजनाओं, खनन और बुनियादी ढांचे के नाम पर आदिवासियों की जमीनें छीनी जा रही हैं

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) की 2020 की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में सबसे ज्यादा विस्थापन आदिवासी समुदायों का हुआ हैगुजरात में 2017 के बाद से यह आंकड़ा और बढ़ा है नर्मदा बांध परियोजना ने पहले ही लाखों आदिवासियों को उजाड़ा, और अब नई परियोजनाएं उनके अस्तित्व पर कुल्हाड़ी चला रही हैं

जरा सोचिए, आपके घर को, आपके खेत को, आपकी यादों को एक दिन बुलडोजर से ढहा दिया जाएक्या आप चुप रहेंगे?


सांस्कृतिक नरसंहार: परंपराओं का तितर-बितर होना

आदिवासी समुदाय की संस्कृति सिर्फ रंग-बिरंगे नृत्य या हस्तशिल्प नहीं है; यह उनकी पहचान है, उनकी आत्मा हैलेकिन औद्योगीकरण और शहरीकरण के नाम पर उनकी परंपराएं, उनके पवित्र स्थल, और उनकी जीवनशैली को कुचला जा रहा है संयुक्त राष्ट्र के स्वदेशी लोगों के अधिकारों पर घोषणा पत्र (UNDRIP, 2007) में स्पष्ट कहा गया है कि स्वदेशी समुदायों की संस्कृति और जमीन का संरक्षण करना हर देश की जिम्मेदारी हैलेकिन गुजरात में यह जिम्मेदारी कौन निभा रहा है?

आदिवासियों के पवित्र जंगलों को काटा जा रहा है, उनके तीर्थस्थलों को नष्ट किया जा रहा है जोतिबा फुले ने ठीक ही कहा था, "अंग्रेजों से बुरे तो ये लोग हैं।" जब अपने ही देश में आदिवासियों को उनकी जमीन और संस्कृति से बेदखल किया जा रहा हो, तो यह अंग्रेजों के शासन से कम दर्दनाक नहीं है

क्या हमारी संस्कृति सिर्फ मंदिर-मस्जिद तक सीमित है? क्या आदिवासियों की संस्कृति को बचाना हमारा कर्तव्य नहीं?


नेताओं और संगठनों की चुप्पी: एक गहरी साजिश?

आदिवासी समुदाय ने अपने वोट से नेताओं को चुना, संगठनों को ताकत दी, लेकिन आज वही नेता और संगठन खामोश हैं ट्राइबल एडवाइजरी काउंसिल (TAC), जो आदिवासियों के हितों की रक्षा के लिए बनाई गई थी, क्यों चुप है? सत्ताधारी दल के नेता, विपक्षी नेता, और यहां तक कि आदिवासी संगठन भी इस अन्याय पर कुछ नहीं बोल रहे

क्या ये सब सिर्फ अपनी कुर्सी और पार्टी के हितों के लिए काम कर रहे हैं? क्या आदिवासियों का वोट सिर्फ सत्ता पाने का जरिया है? X पर TribalArmy ने लिखा, "वर्तमान सरकार की नीतियों ने आदिवासी समाज के साथ अन्याय को और गंभीर बना दिया है।" लेकिन सवाल यह है कि जब आदिवासी संगठन और नेता ही चुप हैं, तो आम आदिवासी अपनी आवाज कैसे उठाए?

क्या यह चुप्पी एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा है? क्या आदिवासियों को जानबूझकर हाशिए पर धकेला जा रहा है?


अंतरराष्ट्रीय मंच पर आदिवासी अधिकार

संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) ने आदिवासी समुदायों के लिए कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए हैं ILO कन्वेंशन 169 में कहा गया है कि स्वदेशी समुदायों को उनकी जमीन, संसाधनों और संस्कृति पर पूर्ण अधिकार हैभारत ने इस कन्वेंशन पर हस्ताक्षर नहीं किए, लेकिन UNDRIP के तहत भारत को नैतिक जिम्मेदारी निभानी चाहिए

सुप्रीम कोर्ट ने भी समता बनाम आंध्र प्रदेश (1997) मामले में कहा था कि आदिवासी क्षेत्रों में खनन या औद्योगिक परियोजनाओं के लिए उनकी सहमति अनिवार्य हैलेकिन गुजरात में क्या हो रहा है? बिना सहमति के परियोजनाएं थोपी जा रही हैं, और विरोध करने वालों को दबाया जा रहा है

जब अंतरराष्ट्रीय मंच आदिवासियों के हक की बात करते हैं, तो भारत में उनकी आवाज क्यों दबाई जा रही है?


जोतिबा फुले की चेतावनी और आज का सच

जोतिबा फुले ने 19वीं सदी में दलितों और आदिवासियों के शोषण के खिलाफ आवाज उठाई थीउनकी बातें आज भी प्रासंगिक हैंउन्होंने कहा था कि सत्ता में बैठे लोग जनता को सिर्फ अपने हितों के लिए इस्तेमाल करते हैंगुजरात में आदिवासियों के साथ जो हो रहा है, वह फुले की चेतावनी का जीता-जागता सबूत है

राष्ट्रीय जनजातीय अनुसंधान संस्थान की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में आदिवासी समुदायों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पिछले दो दशकों में और खराब हुई हैशिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अवसरों में उनकी हिस्सेदारी के बराबर हैफिर भी, सरकारें विकास का ढोल पीट रही हैं

क्या यह विकास सिर्फ कॉरपोरेट्स के लिए है? क्या आदिवासियों का शोषण हमारी प्रगति का आधार है?


लोग क्या कर सकते हैं?

यह सिर्फ आदिवासियों की लड़ाई नहीं, यह हर उस इंसान की लड़ाई है जो न्याय और समानता में विश्वास रखता हैआप क्या कर सकते हैं?

  1. आवाज उठाएं: सोशल मीडिया पर आदिवासियों के मुद्दों को शेयर करें#SaveTribalRights जैसे हैशटैग का इस्तेमाल करें
  2. जानकारी फैलाएं: अपने दोस्तों और परिवार को संविधान और आदिवासी अधिकारों के बारे में बताएं
  3. नेताओं से सवाल करें: अपने जनप्रतिनिधियों से पूछें कि वे आदिवासियों के हक के लिए क्या कर रहे हैं
  4. संगठनों का समर्थन करें: उन NGO और संगठनों की मदद करें जो आदिवासियों के लिए काम कर रहे हैं
  5. कानूनी सहायता: अगर आपके आसपास आदिवासी समुदाय के लोग हैं, तो उन्हें उनके कानूनी अधिकारों के बारे में जागरूक करें

आज चुप रहने का मतलब है अन्याय को स्वीकार करनाक्या आप चुप रहेंगे?


नेताओं और संगठनों को उनकी जिम्मेदारी याद दिलाएं

नेताओं, आदिवासी संगठनों और जनप्रतिनिधियों, यह आपकी जिम्मेदारी है कि आप उन लोगों की आवाज बनें जिन्होंने आपको चुना TAC को सक्रिय करें, FRA और पेसा को लागू करवाएंअगर आप चुप रहे, तो इतिहास आपको माफ नहीं करेगाआदिवासी समुदाय का विश्वास टूट रहा है, और यह विश्वास तोड़ने की कीमत आपको अपनी साख से चुकानी पड़ सकती है

क्या आप सिर्फ वोट की राजनीति करेंगे, या आदिवासियों के हक के लिए खड़े होंगे?


अंतिम सवाल: क्या यह साजिश नहीं?

गुजरात मॉडल को विकास का पर्याय बताया जाता है, लेकिन यह विकास किसके लिए है? जब आदिवासियों की जमीन छीनी जा रही हो, उनकी संस्कृति नष्ट हो रही हो, और उनके अधिकार कुचले जा रहे हों, तो यह विकास नहीं, यह एक सांस्कृतिक और सामाजिक नरसंहार है

क्या यह सब जानबूझकर किया जा रहा है? क्या आदिवासियों को हाशिए पर धकेलने की साजिश रची जा रही है?

आज जरूरत है कि हम सब एकजुट होंआदिवासियों के साथ हो रहे इस अन्याय को रोकने के लिए आवाज उठाएंक्योंकि अगर आज हम चुप रहे, तो कल हमारी बारी होगी

क्या आप इस साजिश को चुपचाप देखेंगे, या इसके खिलाफ आवाज उठाएंगे?

डॉ. भाविनकुमार शांतिलाल वसावा, भरूच
आदिवासी अधिकारों के लिए संघर्षरत एक आवाज

 

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