"नर्मदा के आंचल में लालच का जाल: कबीरवड की पुकार"
"पावन नर्मदा के बीच बसा कबीरवड, जहां कभी संत कबीर के भजनों की गूंज थी, आज मशीनों की घरघराहट और लालच के अंधेरे में खोता जा रहा है।"
भारत के पश्चिम में, नर्मदा नदी के बीचोबीच बसी एक रहस्यमयी द्वीप, कबीरवड, जहां संत कबीर ने ध्यान लगाया था, आज खतरे में है। बरगद के घने पेड़, नर्मदा की शीतल धारा और पौराणिक गाथाओं से गूंथी इस भूमि पर अब लालच का अंधेरा छाया हुआ है।
यह कहानी रेती खनिज की है, जहां नर्मदा नदी के पावन जल पर अवैध खनन और पुलिया निर्माण के जरिए इसकी आत्मा को छलनी किया जा रहा है।
अवैध पुलिया और रेती खनन का खेल
कबीरवड के आसपास के दिन और रातें अब शांत नहीं रहीं। सरेआम तरीके से नर्मदा नदी पर पुलिया बनाई जा रही हैं, ताकि नर्मदा नदी की रेत को दिन-रात निकाला जा सके। बड़ी मशीनें और ट्रक रात के अंधेरे में काम करते हैं। अधिकारी आंखें मूंदे बैठे हैं, और पूरा प्रशासन इस खेल में शामिल दिखता है।
गांववालों का कहना है कि ये पुलिया नर्मदा के प्राकृतिक प्रवाह को बाधित कर रही हैं। नदी के तटों का कटाव बढ़ रहा है, और बरसात में बाढ़ का खतरा कई गुना बढ़ गया है।
गांववालों का दर्द
कबीरवड के आसपास के गांवों के लोगों की ज़िंदगी नर्मदा पर निर्भर है। उनकी रोज़ी-रोटी, उनकी संस्कृति, सब कुछ इस नदी के साथ जुड़ा है। लेकिन अब उन्हें अपनी पहचान खोने का डर सता रहा है।
गांव के लोगोका कहना हैं:
"पहले, नर्मदा का पानी इतना साफ था कि इसमें से मछलियां झलकती थीं। लेकिन अब ये खनन और पुलिया की वजह से पानी गंदा हो गया है। मछलियां खत्म हो रही हैं, और हमारा पेट भरने का सहारा भी छिन रहा है।"
बूढ़ी माँ आंसुओं के साथ कहती हैं:
"कबीरवड सिर्फ एक द्वीप नहीं है, यह हमारी आस्था है। हमने अपने बच्चों को यहां की कहानियां सुनाई हैं। लेकिन अब ये लालच हमारी पवित्र धरती को निगल रहा है।"
प्रशासन की मिलीभगत
एक गुप्त सूचना के अनुसार कबीरवड पर हो रहे अवैध खनन के पीछे बड़े नेताओं, उद्योगपतियों, और अधिकारियों का गठजोड़ है।
जांच के दौरान जिला भूवैज्ञानिक का एक पत्र मिला, जिसमें कबीरवड को खनन के लिए उपयुक्त क्षेत्र घोषित किया गया था। लेकिन यह फैसला नियमोको नजरअंदाज करते हुए लिया गया है।
पाया गया है कि रेती खनन की इजाजत देने के लिए अधिकारी बिना किसी जन-सुनवाई और नियमों का पालन किए ही हस्ताक्षर कर रहे हैं। यहां तक कि पुलिया निर्माण को भी अनदेखा किया जा रहा है, जो नर्मदा के प्रवाह को बाधित कर रहा है और जल जीवन और पर्यावरण को नुकशान कर रहा है।
वसावा: एक पर्यावरण योद्धा
कबीरवड को बचाने के लिए आदिवासी युवा वसावा ने कमान संभाली। उन्होंने विज्ञान में पढ़ाई की है और अपनी मिट्टी को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे है।
वह कहते है:
"ये पुलिया और खनन न सिर्फ हमारी धरती को बर्बाद कर रहे हैं, बल्कि हमारी संस्कृति, हमारी आस्था और हमारी नदी की आत्मा को भी नष्ट कर रहे हैं।"
वसावा ने खुलासा किया कि खनन माफिया यहां पुलिया बनाकर नर्मदा की रेत का शोषण कर रहे हैं। साथ ही, कबीरवड के भीतर एक प्राचीन वड और मंदिर है, जो कबीर के समय का माना जाता है। इस को भी खनन माफिया नजर अंदाज कर रहे है।
वसावा ने पुलिया पर हो रही गतिविधियों को रिकॉर्ड किया। जब वे मौके पर पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि बड़ी मशीनें और ट्रक रेत निकालने में जुटे हैं। इसी दौरान, खनन माफिया के गुंडों ने उन्हें घेर लिया।
वसावा ने अपनी जान जोखिम में डालकर इस अवैध खनन का वीडियो बनाया और पुलिस को तोड़ने के लिए प्रशासन को भी बताया। अब आगे क्या होता है देखते है।
कबीरवड को बचाने का संकल्प
वसावा की मुहिम है की कबीरवड को संवेदनशील और संरक्षित क्षेत्र घोषित कर दिया जाये। अवैध पुलिया तोड़ दी जाये।
पाठकों के लिए संदेश
"नर्मदा केवल एक नदी नहीं है, यह हमारी संस्कृति और हमारी आत्मा है।"
कबीरवड को बचाना न सिर्फ हमारी जिम्मेदारी है, बल्कि हमारी पीढ़ियों के लिए एक कर्तव्य भी है। इस कहानी को साझा करें और प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा के लिए आवाज उठाएं।
"चलो, मिलकर यह संकल्प लें कि कबीरवड और नर्मदा की गूंज हमेशा बनी रहे।"
डॉ. भाविनकुमार शांतिलाल वसावा
भरूच
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