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Sunday, December 29, 2024

आदिवासी समाज के हक और अधिकार: क्या हम सचमुच जागरूक हैं? 🤔

 


आदिवासी समाज के हक और अधिकार: क्या हम सचमुच जागरूक हैं? 🤔

आदिवासी समाज के कई नेता बरसों से "भील प्रदेश" की परिकल्पना करते आए हैं, और जनता को भी इसके लिए प्रेरित करते रहे हैंलेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह मृगजल की भाती क्यों लगता है? 🦌 यह मांग शायद उचित हो, लेकिन इसके लिए अभी समय लगेगा, क्योंकि इसके लिए कई कठिन पड़ाव पार करने होंगेउदाहरण के लिए, समाज में एकजुटता का होना और सभी राजनीतिक दलों एवं जन प्रतिनिधियों का एक साथ आना आवश्यक हैपरंतु तब तक क्या हम आदिवासी समाज के हितों के लिए कुछ और कदम नहीं उठा सकते? 🤷♂️

हमारे संविधान में अनुसूची 5 और 6 के तहत आदिवासी समाज के अधिकारों का स्पष्ट उल्लेख किया गया है, समता जजमेंट में भी माननीय सुप्रीम कोर्ट ने आदिवासी लोगों के हक और अधिकारों के लिए निर्देश दिए हैं, The Panchayats (Extension to Scheduled Areas) Act, 1996 (PESA Act) और इनसे जुड़ी कुछ कानूनी व्यवस्थाएं भी हैंलेकिन इन अधिकारों को पूरी तरह से लागू करना अब भी एक बड़ा सवाल हैइसके लिए केवल आदिवासी जन प्रतिनिधियों को वोट देने से कुछ नहीं होगाहमें आदिवासी समाज के हर सदस्य को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगीकेवल वोट देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि समाज के हर सदस्य को अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना होगातभी हम आदिवासी समाज का भला कर सकेंगे

आधुनिक समय में शिक्षित आदिवासी युवाओं को इस दिशा में सक्रिय रूप से आगे आना होगाउन्हें अपने प्रयासों से आदिवासी समाज के मुद्दों को उजागर करना होगा आरटीआई, शिकायतें, आवेदन, नियम-कानूनइन सभी चीजों के बारे में आदिवासी समाज को जागरूक करने की आवश्यकता हैजो लोग आदिवासी अधिकारों के लिए काम कर रहे हैं, हमें उनकी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मदद करनी होगी🙌

उदहारण के लिए - खनिज खदानों का मुद्दा: आदिवासी क्षेत्रों में क्या हो रहा है? 💎

आजकल आदिवासी क्षेत्रों में खनिज खदानों के मामले में गंभीर समस्याएं सामने रही हैंवर्षों से आदिवासी क्षेत्रों में खनिज खनन हो रहा है, लेकिन इससे आदिवासी समाज को कोई खास लाभ नहीं मिल रहावास्तव में, अधिकांश खदानों का संचालन गैर-आदिवासी लोग कर रहे हैंजबकि आदिवासी समुदाय के लोग खुद इन खदानों के मालिक बनकर, अपने गाँव और समुदाय के हित में खनन कर सकते हैंइसमें विशेष शिक्षा की भी जरूरत नहीं है; बस एकजुटता और सही दिशा की आवश्यकता है💪

संविधान की अनुसूची 5 और 6 के तहत आदिवासी क्षेत्रों में खनिज पर अधिकार आदिवासी समुदाय के पास हैयह स्पष्ट रूप से कई कानूनों में वर्णित है कि इन क्षेत्रों में खनिज का पट्टा केवल स्थानीय आदिवासी लोगों को ही मिल सकता हैलेकिन आज के समय में, इन क्षेत्रों में अधिकांश खदानों का संचालन गैर-आदिवासी लोग कर रहे हैंयह अनदेखी और उल्लंघन हमारे संविधानिक अधिकारों की सीधे-सीधे अवहेलना है⚖️

आदिवासी क्षेत्र के खनिज व्यवसाय में भ्रष्टाचार और अवैध खनन 🏚️

आजकल आदिवासी क्षेत्रों में खनिज खनन का व्यवसाय राज्य के बड़े-बड़े नेताओं और उनके गैर-आदिवासी सहयोगियों के हाथों में हैकई बार आदिवासी समुदाय के जन प्रतिनिधि, जो खनिज व्यवसाय में संलिप्त हैं, वे माइनिंग प्लान, पर्यावरण स्वीकृति, रोयल्टी का सही उपयोग जैसे नियमों की अवहेलना करते हुए खनन करते हैंइस प्रक्रिया में कई बार अवैध खनन भी हो जाता हैजब इन लोगों को अवैध खनन के बारे में पता चलता है, तो वे इतने दबाव में जाते हैं कि कुछ बोल भी नहीं पातेयही स्थिति कई अन्य व्यवसायों में भी देखी जाती है, जहां गलत कामों का समर्थन किया जाता है, और फिर इसे सुधारने का अवसर नहीं मिलता⚠️

क्या आदिवासी समाज का भला होगा? 🤷♀️

इस स्थिति में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि आदिवासी समाज का भला कौन करेगा? इसका उत्तर बहुत स्पष्ट हैहमारे समाज के हर एक व्यक्ति को अपने कर्तव्यों को समझते हुए इस दिशा में कदम बढ़ाना होगासमाज के प्रत्येक सदस्य को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी, तभी आदिवासी समाज का भविष्य सुरक्षित हो सकता है

समाज को एकजुट होना होगाआदिवासी समाज के लोग अगर खुद अपनी आवाज उठाने और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने में संलग्न हो जाएं, तो वे केवल खुद के लिए, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक मजबूत आधार तैयार कर सकते हैं

जय आदिवासी जय जोहर! 🙏

डॉ. भविनकुमार शांतीलाल वसावा
तलुका: झगड़िया
जिला: भरूच, गुजरात, भारत

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