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Sunday, November 17, 2024

गुजरात में अनुसूचित जनजातियों के संवैधानिक अधिकारों पर खतरे!

 


गुजरात में अनुसूचित जनजातियों के संवैधानिक अधिकारों पर खतरे:

गुजरात नगरपालिकाएँ (अध्यक्ष के पद पर एससी, एसटी, एसईबीसी और महिलाओं के लिए आरक्षण) (संशोधन) नियम, 2024 और गुजरात स्थानीय प्राधिकरण कानून (संशोधन) अधिनियम, 2023 के संदर्भ में

गुजरात सरकार द्वारा हाल ही में लागू किए गए गुजरात नगरपालिकाएँ (अध्यक्ष के पद पर एससी, एसटी, एसईबीसी और महिलाओं के लिए आरक्षण) (संशोधन) नियम, 2024 और गुजरात स्थानीय प्राधिकरण कानून (संशोधन) अधिनियम, 2023 ने स्थानीय निकायों में अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के आरक्षण और प्रतिनिधित्व पर नए सवाल खड़े कर दिए हैंयह लेख इन कानूनों के संभावित प्रभावों, विशेष रूप से अनुसूचित जनजातियों के संवैधानिक अधिकारों पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों का विश्लेषण करेगा


संशोधनों की प्रमुख विशेषताएँ

1. गुजरात नगरपालिकाएँ (आरक्षण) नियम, 2024

  • नगरपालिकाओं के अध्यक्ष पद पर आरक्षण के लिए एक रोटेशनल रोस्टर प्रणाली लागू की गई है
  • इसमें महिलाओं, अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी), और सामाजिक तथा शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों (एसईबीसी) के लिए आरक्षित सीटों का निर्धारण किया गया है
  • रोटेशन प्रणाली का उद्देश्य सभी समूहों को समय-समय पर प्रतिनिधित्व देना है

2. गुजरात स्थानीय प्राधिकरण कानून (संशोधन) अधिनियम, 2023

  • एसईबीसी के लिए आरक्षण को 10% से बढ़ाकर 27% किया गया है
  • कुल आरक्षण को 50% की संवैधानिक सीमा में सीमित रखा गया है
  • एससी और एसटी के लिए आरक्षण को बनाए रखा गया है, लेकिन उनके आरक्षण को प्रभावित किए बिना एसईबीसी का विस्तार सुनिश्चित करने की बात कही गई है


अनुसूचित जनजातियों के लिए संभावित चिंताएँ और नुकसान

1. आरक्षण के असंतुलन का खतरा

  • एसईबीसी आरक्षण में 17% की वृद्धि से अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों का प्रतिशत सीधे तौर पर नहीं घटेगा, लेकिन उपलब्ध सीटों में अप्रत्यक्ष रूप से कमी सकती है
  • यदि एसईबीसी के लिए बढ़ी हुई आरक्षण सीमा, एसटी बहुल क्षेत्रों में लागू होती है, तो एसटी की राजनीतिक भागीदारी कमजोर हो सकती है

2. रोटेशन प्रणाली में विसंगतियाँ

  • रोटेशनल रोस्टर प्रणाली का क्रियान्वयन चुनौतीपूर्ण हो सकता है
  • यदि रोस्टर सही ढंग से लागू नहीं हुआ, तो एसटी उम्मीदवारों के अवसर कम हो सकते हैं
  • इस प्रक्रिया में देरी या गलत प्रबंधन से एसटी के हितों को हानि हो सकती है

3. महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रभाव

  • अनुसूचित जनजातियों के भीतर महिलाओं के लिए आरक्षित कोटा, सामान्य एसटी आरक्षण के हिस्से से लिया जाएगा
  • यह पुरुष एसटी प्रतिनिधियों के अवसरों को सीमित कर सकता है, जिससे समुदाय के भीतर असंतोष बढ़ सकता है

4. संविधान के अनुच्छेद 243D और 332 का संभावित उल्लंघन

  • संविधान के अनुच्छेद 243D स्थानीय निकायों में अनुसूचित जनजातियों को उनकी आबादी के अनुपात में आरक्षण प्रदान करता है
  • यदि एसटी बहुल क्षेत्रों में एसईबीसी या अन्य वर्गों को वरीयता दी जाती है, तो यह संवैधानिक प्रावधानों के खिलाफ हो सकता है
  • यह मामला न्यायिक विवाद का कारण बन सकता है

5. समाज में असमानता का बढ़ना

  • एसटी समुदाय पहले से ही सामाजिक और आर्थिक रूप से हाशिए पर है
  • नए संशोधनों से एसटी प्रतिनिधित्व की संरचनात्मक बाधाएँ बढ़ सकती हैं, जिससे समुदाय की आवाज और अधिकार और अधिक कमजोर हो सकते हैं


संभावित समाधान और अनुशंसाएँ

1. आंकड़ों पर आधारित योजना

  • जनगणना और क्षेत्रीय सर्वेक्षणों का उपयोग करके सुनिश्चित किया जाए कि एसटी के लिए आरक्षण उनके जनसंख्या अनुपात के अनुसार हो
  • एसईबीसी विस्तार के बावजूद एसटी बहुल क्षेत्रों में उनकी भागीदारी कम हो

2. रोटेशन प्रणाली की पारदर्शिता

  • रोटेशन प्रणाली का स्पष्ट और समय पर क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाए
  • सभी आरक्षित सीटों की समयबद्ध जानकारी सार्वजनिक की जाए

3. ग्रामीण और आदिवासी समुदायों का संरक्षण

  • एसटी बहुल क्षेत्रों में एसईबीसी आरक्षण को सीमित किया जाए
  • एसटी समुदायों को उनकी विशेष स्थिति के आधार पर प्राथमिकता दी जाए

4. न्यायिक और प्रशासनिक निगरानी

  • सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों का पालन करते हुए, संशोधनों का परीक्षण किया जाए
  • स्वतंत्र निकायों द्वारा संशोधनों के प्रभाव की नियमित समीक्षा की जाए

5. समुदाय जागरूकता और भागीदारी

  • एसटी समुदाय को उनके अधिकारों और आरक्षण नीतियों के बारे में जागरूक किया जाए
  • स्थानीय निकायों में उनकी सक्रिय भागीदारी को प्रोत्साहित किया जाए


निष्कर्ष

गुजरात में लागू किए गए ये संशोधन स्थानीय निकायों में आरक्षण के परिप्रेक्ष्य को बदलने की कोशिश हैंहालांकि, अनुसूचित जनजातियों के संवैधानिक अधिकारों और प्रतिनिधित्व पर इनका संभावित नकारात्मक प्रभाव चिंता का विषय है

सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि एसटी समुदाय को नुकसान हो और उनके अधिकार संरक्षित रहेंइस विषय पर न्यायपालिका, प्रशासन और समाज के सभी वर्गों का सतर्क दृष्टिकोण आवश्यक है ताकि भारत के संवैधानिक मूल्यों का पालन किया जा सके

क्या हम विकास के नाम पर किसी समाज के अधिकारों को सीमित कर सकते हैं? यह सवाल नीतिगत चर्चाओं और न्यायिक परीक्षण के केंद्र में होना चाहिए

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